विशेष आलेख: अगस्त क्रांति 1942: जब भारत ने अंग्रेजों से कहा, अब भारत छोड़ो- डॉ. कठेरिया

Sun 09-Aug-2026,12:43 PM IST +05:30

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विशेष आलेख: अगस्त क्रांति 1942: जब भारत ने अंग्रेजों से कहा, अब भारत छोड़ो- डॉ. कठेरिया विशेष आलेख: अगस्त क्रांति 1942: जब भारत ने अंग्रेजों से कहा, अब भारत छोड़ो- डॉ. कठेरिया
  • 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ।​

  • 9 अगस्त को नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन जनप्रतिरोध में बदल गया।​

  • अगस्त क्रांति ने 1947 की स्वतंत्रता की अंतिम यात्रा को नई दिशा दी।​

Maharashtra / Nagpur :

Nagpur / भारत की स्वतंत्रता किसी एक दिन, एक आंदोलन या एक नेता के प्रयास का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे लंबे समय तक चला राजनीतिक संघर्ष, जनजागरण, असहयोग, सविनय अवज्ञा, क्रांतिकारी गतिविधियां और असंख्य ज्ञात-अज्ञात लोगों का त्याग था। 1942 तक यह संघर्ष ऐसे निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका था, जहां भारतीयों के सामने केवल राजनीतिक सुधार नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन से मुक्ति का प्रश्न था। द्वितीय विश्व युद्ध ने परिस्थिति को और जटिल बनाया। ब्रिटिश सरकार ने भारत को युद्ध में शामिल किया, लेकिन भारतीय नेतृत्व को सत्ता और स्वतंत्रता पर संतोषजनक आश्वासन नहीं दिया। इसी बीच जापान की सेनाएं दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से आगे बढ़ रही थीं। सिंगापुर के पतन और बर्मा पर मंडराते खतरे ने भारत की सुरक्षा को भी युद्ध की सीधी चिंता बना दिया था। ब्रिटेन को भारतीय सहयोग की जरूरत थी, जबकि भारतीय नेतृत्व स्वतंत्रता के लिए निर्णायक दबाव की संभावना देख रहा था। क्रिप्स मिशन की विफलता ने निराशा को और गहरा किया। ऐसे वातावरण में अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान हुआ। 8 अगस्त को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में प्रस्ताव पारित हुआ और महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का संदेश दिया। अगले ही दिन ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन नेतृत्व को जेल में डालने के बावजूद स्वतंत्रता की आवाज शांत नहीं हुई। विद्यार्थी, युवा, महिलाएं, किसान, मजदूर और स्थानीय कार्यकर्ता अनेक क्षेत्रों में आगे आए। इसीलिए 1942 का संघर्ष केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि व्यापक जनप्रतिरोध और स्वतंत्रता की अंतिम यात्रा का निर्णायक अध्याय बन गया।

1942 की पृष्ठभूमि: युद्ध, राजनीतिक संकट और बदलती परिस्थितियां
भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी थी। सितंबर 1939 में युद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की पर्याप्त सहमति के बिना भारत को भी युद्ध में शामिल कर दिया। कांग्रेस ने विरोध किया और स्पष्ट राजनीतिक आश्वासन की मांग की। कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया। भारतीय नेतृत्व के सामने प्रश्न था: यदि ब्रिटेन लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के नाम पर युद्ध लड़ रहा है, तो भारत स्वयं राजनीतिक स्वतंत्रता से वंचित क्यों रहे? युद्ध ने आम जीवन को प्रभावित किया। महंगाई, आवश्यक वस्तुओं की कमी और युद्ध संबंधी दबावों ने जनता की कठिनाइयां बढ़ाईं। 1942 की शुरुआत में जापानी सेनाओं की दक्षिण-पूर्व एशिया में तेज प्रगति ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। सिंगापुर का पतन और बर्मा की ओर जापानी बढ़त ब्रिटिश शासन के लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती थी। भारत की सामरिक स्थिति महत्वपूर्ण हुई और ब्रिटेन को भारतीय सहयोग की जरूरत बढ़ी। भारतीय नेतृत्व के लिए भी यह प्रश्न अधिक तीखा हुआ कि जिस देश की जनता और संसाधनों का उपयोग युद्ध में किया जा रहा है, उसे राजनीतिक स्वतंत्रता क्यों नहीं दी जा रही। इसी वातावरण में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं को साथ लेने का नया प्रयास किया।
इस दौर में भारतीय राजनीति के भीतर भी मतभेद स्पष्ट थे। मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया। लीग की चिंता यह थी कि तत्काल ब्रिटिश वापसी से पहले मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक भविष्य पर कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है, और इसी कारण उसने युद्ध में ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग की नीति जारी रखी। यह मतभेद आगे चलकर भारतीय राजनीति के विभाजन-मार्ग को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है।

क्रिप्स मिशन: उम्मीद से निराशा तक
मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। उद्देश्य था युद्ध के दौरान भारतीय सहयोग प्राप्त करना और राजनीतिक समझौते की संभावना तलाशना। क्रिप्स प्रस्ताव में युद्ध की समाप्ति के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने की बात थी, लेकिन तत्काल सत्ता हस्तांतरण की स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। भारतीय नेतृत्व के लिए यह प्रस्ताव तत्काल स्वतंत्रता की अपेक्षा पूरी नहीं करता था। कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया। महात्मा गांधी ने इसकी आलोचना करते हुए इसे "डूबते हुए बैंक का पोस्ट-डेटेड चेक" कहा। मिशन की असफलता केवल एक वार्ता की विफलता नहीं थी। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि ब्रिटिश सरकार तत्काल सत्ता साझा करने या स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं है। बातचीत के माध्यम से समाधान की संभावना कमजोर हुई और निर्णायक जनसंघर्ष की दिशा अधिक स्पष्ट होने लगी। यही विफलता अगस्त क्रांति की तात्कालिक राजनीतिक पृष्ठभूमि बनी।

8 अगस्त 1942: वह ऐतिहासिक रात
क्रिप्स मिशन की विफलता के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की 14 जुलाई 1942 को वर्धा में बैठक हुई। इसके बाद 8 अगस्त को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की ऐतिहासिक बैठक हुई। ग्वालिया टैंक मैदान में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे बाद में अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा। प्रस्ताव का केंद्रीय उद्देश्य ब्रिटिश शासन को भारत से समाप्त करना और भारतीयों को अपनी राजनीतिक नियति तय करने का अधिकार दिलाना था। गांधीजी ने स्वतंत्रता के लिए अंतिम संघर्ष का आह्वान करते हुए "करो या मरो" का संदेश दिया। इसका अर्थ था कि अब स्वतंत्रता की मांग को टालने के बजाय उसके लिए पूरी शक्ति से संघर्ष किया जाए। आंदोलन की भाषा क्रमिक सुधार से आगे बढ़कर तत्काल स्वतंत्रता की मांग की भाषा बन चुकी थी। ब्रिटिश सरकार ने इसे गंभीर चुनौती माना और नेतृत्व पर तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।

यह उल्लेखनीय है कि भारत छोड़ो प्रस्ताव पर कांग्रेस के भीतर भी पूर्ण सहमति नहीं थी। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी इस प्रस्ताव के विरोध में थे। उनका मानना था कि युद्धकाल में इस प्रकार का सीधा टकराव व्यावहारिक नहीं है, और उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ समझौते की वकालत करते हुए कांग्रेस कार्यसमिति तथा केंद्रीय विधानसभा दोनों से त्यागपत्र दे दिया। यह असहमति दिखाती है कि भारत छोड़ो आंदोलन किसी एकमत निर्णय का सरल परिणाम नहीं था, बल्कि उस समय के भारतीय राजनीतिक नेतृत्व के भीतर रणनीति को लेकर गंभीर मंथन का परिणाम था।

9 अगस्त 1942: गिरफ्तारियां और आंदोलन का विस्फोट
8 अगस्त की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद ब्रिटिश सरकार ने कार्रवाई शुरू कर दी। 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गांधीजी को पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंद किया गया, जबकि कई अन्य वरिष्ठ नेताओं को अहमदनगर किले और अन्य स्थानों पर बंद किया गया। ब्रिटिश प्रशासन का अनुमान था कि नेतृत्व को गिरफ्तार करके आंदोलन की रीढ़ तोड़ दी जाएगी। लेकिन यही अनुमान गलत साबित हुआ। गिरफ्तारी की खबर फैलते ही देश के अनेक हिस्सों में स्वतःस्फूर्त विरोध शुरू हो गया। यह वर्षों से जमा राजनीतिक असंतोष और स्वतंत्रता की आकांक्षा का विस्फोट था। नेताओं की आवाज जेल के भीतर सीमित हुई, लेकिन आंदोलन की ऊर्जा जनता के बीच फैल गई। यही क्षण भारत छोड़ो आंदोलन को व्यापक जनप्रतिरोध का स्वरूप देने वाला बना।

जब जनता बनी आंदोलन की ताकत
अगले कुछ हफ्तों में आंदोलन का चरित्र तेजी से बदल गया। विद्यार्थी और युवा कार्यकर्ता विरोध में शामिल हुए। कई जगह मजदूरों ने हड़तालों में हिस्सा लिया और किसान भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आंदोलन से जुड़े। महिलाओं ने जुलूसों, संदेश पहुंचाने और प्रतिरोध की गतिविधियों में भाग लिया। छोटे शहरों और गांवों में स्थानीय कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की कमान संभाली। सरकारी संस्थानों और औपनिवेशिक व्यवस्थाओं के बहिष्कार की कोशिशें हुईं। कुछ क्षेत्रों में डाक, रेलवे और संचार व्यवस्था को बाधित करने की कार्रवाइयां भी हुईं। रेलवे पटरियों और टेलीग्राफ लाइनों को नुकसान पहुंचाने तथा सरकारी कार्यालयों और पुलिस थानों पर हमलों जैसी घटनाएं सामने आईं। आंदोलन अब किसी एक नेता की निगरानी में नहीं चल रहा था, बल्कि अनेक स्थानीय नेतृत्वों और समूहों में फैल गया था। इसलिए इसका स्वरूप हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं रहा। कहीं शांतिपूर्ण विरोध हुआ, तो कहीं दमन और प्रतिरोध के बीच संघर्ष अधिक उग्र हो गया।

अरुणा आसफ अली और महिलाओं की भूमिका
9 अगस्त 1942 को जब कांग्रेस के अधिकांश प्रमुख नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे, तब अरुणा आसफ अली ने ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया। यह घटना साहस और प्रतिरोध का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी। इसका संदेश था कि नेताओं को जेल में डालकर आंदोलन की भावना को कैद नहीं किया जा सकता। अरुणा आसफ अली बाद में भूमिगत प्रतिरोध की प्रमुख प्रतीक बनीं। अगस्त क्रांति में महिलाओं की भूमिका केवल एक घटना तक सीमित नहीं थी। मातंगिनी हाजरा और कनकलता बरुआ जैसी महिलाओं का साहस और बलिदान भी इस दौर की स्मृति का हिस्सा है।

भूमिगत आंदोलन: गुप्त रास्तों से आजादी की आवाज
शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भूमिगत हो गया। गुप्त संदेशों, पर्चों और संपर्क नेटवर्क के माध्यम से प्रतिरोध को जीवित रखने का प्रयास हुआ। जयप्रकाश नारायण हजारीबाग जेल से निकलकर भूमिगत गतिविधियों में सक्रिय हुए। राम मनोहर लोहिया ने भी भूमिगत रूप से योगदान दिया। अच्युत पटवर्धन और सुचेता कृपलानी जैसे कार्यकर्ताओं की भूमिका उल्लेखनीय रही। उषा मेहता और उनके साथियों द्वारा चलाया गया गुप्त कांग्रेस रेडियो ब्रिटिश सेंसरशिप के बीच आंदोलन के समाचार और संदेश जनता तक पहुंचाने का साहसी माध्यम बना, जब तक पुलिस ने इसका नेटवर्क पकड़ नहीं लिया। भूमिगत आंदोलन ने दिखाया कि सार्वजनिक नेतृत्व को गिरफ्तार किया जा सकता है, लेकिन स्वतंत्रता की राजनीतिक चेतना को पूरी तरह समाप्त करना कठिन है।

उग्र प्रतिरोध और समानांतर सरकारें
गांधीजी का मूल आह्वान अहिंसक संघर्ष का था, लेकिन व्यापक दमन के बाद कुछ क्षेत्रों में आंदोलन उग्र हुआ। रेलवे लाइनें और टेलीग्राफ के तार काटे गए, सरकारी भवनों को निशाना बनाया गया और कुछ स्थानों पर पुलिस तथा प्रशासन के विरुद्ध सीधा प्रतिरोध हुआ। इन कार्रवाइयों को गांधीजी के अहिंसक सिद्धांत के समान नहीं माना जा सकता, लेकिन वे दमन के बाद उभरे व्यापक असंतोष को दिखाती हैं। इसी दौर में कुछ क्षेत्रों में समानांतर सरकारों का प्रयास हुआ। उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में ब्रिटिश प्रशासन को चुनौती दी गई। बंगाल के तामलुक में तम्रलिप्त जातीय सरकार बनी, जिसने स्थानीय प्रशासन और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा काम किया। महाराष्ट्र के सातारा में नाना पाटिल के नेतृत्व में प्रति सरकार खड़ी हुई, जिसने ब्रिटिश प्रशासन के समानांतर स्थानीय व्यवस्था चलाने का प्रयास किया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि कुछ क्षेत्रों में जनता केवल विरोध नहीं कर रही थी, बल्कि औपनिवेशिक शासन के विकल्प की कल्पना भी कर रही थी।

ब्रिटिश दमन और गांधीजी का 21 दिन का उपवास
भारत छोड़ो आंदोलन के जवाब में ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमन किया। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, लाठीचार्ज और गोलीबारी की घटनाएं सामने आईं और कई स्थानों पर सैन्य बल का इस्तेमाल किया गया। आंदोलनकारियों को जेल भेजा गया तथा भूमिगत कार्यकर्ताओं को पकड़ने के लिए अभियान चलाए गए। गिरफ्तारियों और हताहतों के आंकड़ों को लेकर विभिन्न स्रोतों में अंतर मिलता है, इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है। दमन का पैमाना बड़ा था और उसने खुले जनआंदोलन की गति को कमजोर किया। गांधीजी को आगा खान पैलेस में नजरबंद रखा गया। इसी नजरबंदी के दौरान 10 फरवरी से 3 मार्च 1943 तक, अर्थात इक्कीस दिनों तक, उन्होंने उपवास रखा। यह उपवास सरकार पर नैतिक दबाव बनाने और आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के आरोपों के विरुद्ध अपना पक्ष रखने का प्रयास था। इस उपवास ने भारत और विदेश में व्यापक ध्यान आकर्षित किया। इससे तत्काल कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकला, लेकिन इस उपवास ने गांधीजी के नैतिक प्रभाव को कम नहीं होने दिया। इसके माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के विरुद्ध अपना विरोध दर्ज कराया और यह स्पष्ट किया कि नजरबंदी के बावजूद उनका संघर्ष जारी था। देश और विदेश में इस उपवास को लेकर व्यापक प्रतिक्रिया हुई और भारत छोड़ो आंदोलन के दमन तथा राजनीतिक बंदियों के साथ ब्रिटिश सरकार के व्यवहार पर भी ध्यान गया। इस तरह 21 दिन का उपवास अगस्त क्रांति के व्यापक संघर्ष में गांधीजी के नैतिक प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।

क्या भारत छोड़ो आंदोलन असफल था?
तत्काल राजनीतिक दृष्टि से भारत छोड़ो आंदोलन अपने घोषित उद्देश्य को तुरंत प्राप्त नहीं कर सका। ब्रिटिश सरकार ने व्यापक दमन से खुले आंदोलन को दबा दिया और भारत को 1942 में स्वतंत्रता नहीं मिली। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी लंबे समय तक जेल में रहा। लेकिन केवल इस परिणाम के आधार पर आंदोलन को असफल कहना उसके ऐतिहासिक महत्व को छोटा कर देगा। नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन का विभिन्न क्षेत्रों में जारी रहना दिखाता था कि स्वतंत्रता की आकांक्षा किसी एक नेता या केंद्रीय संगठन की उपस्थिति पर निर्भर नहीं रह गई थी। जनता के अनेक वर्गों ने अपने स्तर पर प्रतिरोध किया। ब्रिटिश शासन के लिए यह संकेत था कि भारतीय समाज के बड़े हिस्से में औपनिवेशिक सत्ता की स्वीकृति कमजोर हो रही है। 1942 ने स्वतंत्रता की मांग को व्यापक जनआकांक्षा के रूप में सामने रखा। इसलिए इसकी सफलता को केवल तत्काल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालीन प्रभाव से भी देखना चाहिए।

1942 से 1947: आजादी की अंतिम यात्रा
भारत छोड़ो आंदोलन के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम की एक और धारा देश से बाहर आकार ले रही थी। सुभाष चंद्र बोस, जो पहले से ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष के पक्षधर थे, 1943 में सिंगापुर पहुंचे और वहां आजाद हिंद फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) का पुनर्गठन कर उसका नेतृत्व संभाला। उन्होंने आजाद हिंद सरकार की भी घोषणा की और "जय हिंद" तथा "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" जैसे नारों से प्रवासी भारतीयों तथा युद्धबंदी सैनिकों में नई चेतना जगाई। यद्यपि आजाद हिंद फौज का सैन्य अभियान अंततः सफल नहीं हो सका, किंतु 1945 में जब इसके अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमा चलाया गया, तो इसने भारत में व्यापक जनसहानुभूति और राजनीतिक हलचल पैदा की।

1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ और ब्रिटेन आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से कमजोर स्थिति में था। आजाद हिंद फौज से जुड़े इन्हीं मुकदमों ने भारत में व्यापक जनसहानुभूति और राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा की। 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह भी ब्रिटिश शासन के सामने नई चुनौती बना और संकेत दिया कि असंतोष सैन्य क्षेत्र तक पहुंच रहा था। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी बदल रही थीं। ब्रिटेन के लिए भारत पर लंबे समय तक राजनीतिक और सैन्य नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता गया। भारत की स्वतंत्रता को केवल भारत छोड़ो आंदोलन का परिणाम मानना उचित नहीं होगा। यह दशकों के राजनीतिक संघर्ष, जनआंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों, आजाद हिंद फौज, सैनिक असंतोष और बदलती परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम थी। फिर भी 1942 इस अंतिम यात्रा का महत्वपूर्ण जन-राजनीतिक मोड़ था। उसने स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता अब सीमित राजनीतिक सुधार नहीं, बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी। बदलती परिस्थितियों के साथ यही मांग 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्रता तक पहुंची।

अगस्त क्रांति की ऐतिहासिक विरासत
अगस्त क्रांति की सबसे बड़ी विरासत यह थी कि इसने स्वतंत्रता संग्राम की शक्ति को शीर्ष नेतृत्व से आगे बढ़ाकर जनता के व्यापक हिस्से में स्थापित कर दिया। 1942 में विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं, किसानों, मजदूरों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिरोध को आगे बढ़ाया। भूमिगत कार्यकर्ताओं ने दमन के बीच आंदोलन की आवाज को जीवित रखा। "करो या मरो" उस दौर के राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बना, लेकिन अगस्त क्रांति का वास्तविक अर्थ उस सामूहिक राजनीतिक चेतना में था जिसने नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी स्वतंत्रता की मांग को जीवित रखा। यह आंदोलन तत्काल भारत को स्वतंत्र नहीं करा सका और 1947 की स्वतंत्रता को केवल इसी एक घटना का परिणाम नहीं माना जा सकता। 

भारत की आजादी एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया थी, जिसमें अनेक आंदोलनों, राजनीतिक प्रयासों, बलिदानों और बदलती परिस्थितियों की भूमिका रही। फिर भी अगस्त 1942 ने ब्रिटिश शासन के सामने भारतीय जनसंकल्प की व्यापकता और दृढ़ता स्पष्ट कर दी। 9 अगस्त की स्मृति हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता के पीछे समाज के अनेक वर्गों का संघर्ष और त्याग होता है। इसी अर्थ में अगस्त क्रांति स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक अध्याय बनती है। उसने भारत की अंतिम स्वतंत्रता यात्रा को नई दिशा दी और ब्रिटिश शासन के सामने यह ऐतिहासिक सत्य स्पष्ट कर दिया कि भारत अब गुलामी को स्थायी रूप से स्वीकार करने वाला नहीं था।

संप्रति:
लेखक : डॉ. धरवेश कठेरिया
एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
Email: [email protected]